पहला अध्याय :-
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| STUDY ACTIVITY - [Bhushan Sahu] |
एकदा मुनयःसर्वे प्रातर्तुतहुताग्नयः । सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात्॥३॥
अर्थ :- एक समय प्रात:कालके हवनादि कृत्योंका सम्पादन करके उन सभी मुनियोंने सत्कार किये गये आसनासीन सूतजी महाराजसे आदरपूर्वक यह पूछा- ॥३॥
कथितो भवता
सम्यग्देवमार्गः सुखप्रदः । इदानीं श्रोतुमिच्छामो यममार्ग भयप्रदम्॥४॥
तथा संसारदुःखानि तत्क्लेशक्षयसाधनम् । ऐहिकामुष्मिकान् क्लेशान् यथावद्वक्तुमर्हसि ॥५॥
अर्थ :- ऋषियोंने कहा-(हे सूतजी महाराज!) आपने सुख देनेवाले देवमार्गका सम्यक् निरूपण किया है। इस
समय हमलोग भयावह यममार्गके विषयमें सुनना चाहते हैं। आप सांसारिक दुःखोंको और उस क्लेशके
विनाशक साधनको तथा इस लोक और परलोकके क्लेशोंको यथावत् वर्णन करनेमें समर्थ हैं। [अत: उसका
वर्णन कीजिये] ॥ ४-५॥
शृणुध्वं भो विवक्ष्यामि यममार्ग सुदुर्गमम् । सुखदं पुण्यशीलानां पापिनां दुःखदायकम्॥६॥
यथा श्रीविष्णुना प्रोक्तं वैनतेयाय पृच्छते । तथैव कथयिष्यामि संदेहच्छेदनाय वः॥७॥
अर्थ :- सूतजी बोले-हे मुनियो! आपलोग सुनें। मैं अत्यन्त दुर्गम यममार्गके विषयमें कहता हूँ, जो
पुण्यात्माजनोंके लिये सुखद और पापियोंके लिये दु:खद है। गरुडजीके पूछनेपर भगवान् विष्णुने (उनसे) जैसा
कुछ कहा था, मैं उसी प्रकार आपलोगोंके संदेहकी निवृत्तिके लिये कहूँगा॥६-७॥
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