पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा का प्रवाह क्या है ? खाद्य श्रृंखला में इसका ह्रास होता है, क्यों?
अथवा
पारितन्त्र में ऊर्जा के प्रवाह से क्या तात्पर्य है ? किसी पारितन्त्र में विभिन्न पोषी स्तरों पर ऊर्जा का
किस प्रकार से ह्रास होता है ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा का प्रवाह - किसी पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा स्रोत से ग्रहण की
गई ऊर्जा को उत्पादकों से विभिन्न उपभोक्ताओं और अपघटकों की ओर भोजन के रूप में स्थानान्तरण होने की
क्रिया को ऊर्जा का प्रवाह कहते हैं।
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पारितन्त्र में ऊर्जा का ह्रास – सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा के एक या दो प्रतिशत भाग को हरे पौधे प्रकाश-
संश्लेषण की क्रिया के द्वारा संगृहीत करते हैं तथा भोज्य पदार्थों में रासायनिक बन्ध के रूप में इकट्ठा कर लेते हैं।
डॉ. कैलाश चन्द्र (1972) के अनुसार-पौधों द्वारा भोज्य पदार्थों के रूप में संचित ऊर्जा का लगभग 90% स्वयं
की जैविक क्रियाओं और उसके शरीर के बाहर ऊष्मा के रूप में निकल जाता है। शेष 10% भाग संचित भोज्य
पदार्थ के रूप में प्राथमिक उपभोक्ताओं द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। इसी प्रकार प्राथमिक उपभोक्ता भी प्राप्त
ऊर्जा का 90% भाग खर्च कर देते हैं और 10% भाग अगली पारितन्त्र श्रेणी को स्थानांतरित कर देते हैं। पारितन्त्र
में यही क्रम चलता रहता है और अन्त में अपघटक मृत जीवों के शरीर में बची शेष ऊर्जा के कुछ भाग को बाहरी
वातावरण में मुक्त कर देते हैं और कुछ का स्वयं उपयोग कर लेते हैं। इस प्रकार पारितन्त्र में ऊर्जा का एक दिशीय
प्रवाह होता रहता है तथा प्रत्येक स्तर में इसमें कमी आती रहती है। अतः पारितन्त्र में आहार-शृंखला जितनी
छोटी होगी, ऊर्जा का ह्यस उतना ही कम होगा।
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