निषेचन की क्रिया विधि का वर्णन एवं इसके महत्व को समझाइये ।
Describe the mechanism of fertilization and explain its importance.
युग्मनज (Zygote) बनने की क्रिया को निषेचन कहते हैं। मनुष्य में अन्त: निषेचन पाया जाता है, अर्थात् इसके
और अण्डाणु मादा के शरीर के अन्दर मिलते हैं
शुक्राणु
।
जब मैथुन के अन्तिम चरण में नर अपने वीर्य को योनि में स्खलित कर देता है, तब गर्भाशय की ग्रीवा की
सिरिंज अवशोषण क्रिया के कारण वीर्य गर्भाशय में चला जाता है। इस चलन में शुक्राणु की पूँछ इसकी मदद
करती है। स्खलन के समय वीर्य में 20 करोड़ की संख्या में शुक्राणु होते हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश योनि की
दीवार के अम्लीय स्राव के कारण मर जाते हैं। इसके अलावा कुछ शुक्राणुओं की हानि मादा के जनन मार्ग के
सँकरे और इसकी दीवार के चिपके होने के कारण होती है। शुक्राणुओं की इस बड़ी संख्या में से केवल कुछ
शुक्राणु ही गर्भाशय में आते हैं और गर्भाशय में पूँछ की सहायता से 1.5 से 3 मिमी प्रति मिनट की चाल से चलते
हुए अण्डवाहिनी में पहुँचते हैं। यहाँ तक शुक्राणुओं की संख्या हजारों या सैकड़ों में ही रह जाती हैं। अण्डवाहिनी
में आकर ये अण्डाणु के चारों तरफ अपने सिर के द्वारा चिपक जाते हैं। इन शुक्राणुओं में से एक शुक्राणु से
सम्पर्क स्थान पर अण्डाणु की बाहरी दीवार फूलकर एक निषेचन शंकु (Fertilization cone) बना देती है।
निषेचन शंकु सम्भवत: उसी शुक्राणु के साथ बनता है जो सबसे पहले अण्डाणु के सक्रिय भाग (Animal pole
रो
=
= अण्डाणु में एक तरफ कोशिकाद्रव्य की मात्रा अधिक होती है, इस भाग को सक्रिय ध्रुव लेकिन दूसरे अर्द्धश
में अपेक्षाकृत कम सान्द्र कोशिकाद्रव्य होता है, इस भाग को निष्क्रिय ध्रुव (Vegetal pole) कहते हैं) को स्पर्श
करता है। एक शंकु के बनने के बाद अण्डाणु दूसरा शंकु नहीं बनाता जिससे अण्डाणु में केवल एक ही शुक्राणु
प्रवेश कर सकता है। अण्डाणु की दीवार से चिपकने के बाद शुक्राणु का एक्रोसोम कुछ प्रकिण्वों को स्रावित
करता है, जिन्हें सामूहिक रूप से स्पर्म लाइसिन (Sperm lysin) कहते हैं। इसके कारण अण्डाणु की दीवार
घुलती जाती है और शुक्राणु धीरे-धीरे अण्डाणु में प्रवेश करता जाता है। ज्यों ही एक शुक्राणु अण्डाणु में प्रवेश
करता है अण्डाणु में कुछ ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं कि इसमें दूसरा शुक्राणु प्रवेश नहीं करता। शुक्राणु का पूँछ भाग
अण्डाणु में प्रवेश नहीं करता, बल्कि अण्डाणु की सतह पर ही विलुप्त हो जाता है और इसका सिर अण्डाणु के
केन्द्रक की तरफ आगे बढ़ जाता है। अण्डाणु के चारों तरफ की पुटिका कोशिकाएँ म्यूकोपॉलीसैकेराइड
(Mucopolysaccharide) और हाइलूरोनिक अम्ल द्वारा एक-दूसरे से चिपकी रहती हैं। इसके लिये शुक्राणु
हाइलूरोनिडेज (Hyaluronidase) प्रकिण्व स्रावित करता है जो इन्हें अपघटित कर देता है। स्तनियों के
शुक्राणुओं में होने वाले उन परिवर्तनों को जो निषेचन में मदद करते हैं, कैपेसिएशन कहते हैं। इस कैपेसिएशन
(Capaciation) क्रिया के दौरान एक्रोसोम के चारों तरफ की झिल्ली टूट जाती है जिसके कारण एक्रोसोम द्वारा
स्पर्म लाइसिन का स्राव होता है, जिसकी सहायता से अण्डाणु जोना रेडिएटा और जोना पेलुसिडा का भेदन होता
है। इन दोनों के बाद अण्डाणु तथा शुक्राणु के सिर की प्लाज्मा झिल्लियाँ भी घुल जाती हैं, फलत: नर तथा मादा
युग्मकों के केन्द्रक पास-पास आ जाते हैं और दोनों के कोशिकाद्रव्य मिल जाते हैं। अब शुक्राणु का केन्द्रक
अण्डाणु के केन्द्रक की ओर जाता है और दोनों मिलकर एक द्विगुणित केन्द्रक बना देते हैं इस अण्डाणु को
युग्मनज कहते हैं। निषेचन की क्रिया पूर्ण होने में लगभग 2 23
2- घण्टे का समय लगता है। अब निषेचित
अण्डाणु गर्भाशय की गुहा की ओर बढ़ता है और लगभग सात दिनों में यह गर्भाशय की गुहा में पहुँच जाता है
और यह यहीं पर गर्भाशय की दीवार में स्थापित हो जाता है। निषेचन के बाद भ्रूणीय प्रावस्था प्रारम्भ होती है।
Answer – Fertilization consisting of sperm (male gamete) and egg (female gamete)
The process of formation of zygote is called fertilization. Interfertilization is found in humans, that is, its
and egg
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